Gayatri Pariwar of Alexandria

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विश्वव्यापी महामारी के संबंध में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी की भविष्यवाणी -*सविता और संसारव्यापी परिवर्तन प्रक्रिया में गायत्री साधना का महत्व *

सूर्य कलंको (sun spots ) के कारण पृथ्वी में प्राकृतिक परिवर्तनो का क्रम ११ साल बाद आता है पर किन्हीं अज्ञात कारणों से अगले दिनों इस नियमों को तोड़कर सूर्य पृथ्वी में परिवर्तन लायेगा | इसमें वृष्टि, अनावृष्टि, सूखा, अकाल, ओलावृष्टि आदि ही नहीं, युद्ध और महामारियों के प्रकोप भी होंगे | उन प्रकोपों में उन्हीं की रक्षा होगी, जो सूर्य से अपना सम्बन्ध जोड़े रहेंगे |
इस तरह की घोषणायें हम काफी समय पहले से ही कर रहे हैं, वह गणित-ज्योतिष और सूर्य विद्या के आधार पर ही करते रहे हैं | वैज्ञानिक निष्कर्ष उसकी पुष्टि ही करते रहे हैं | भारत वर्ष (अखंड भारत) को मुस्लिम और अंग्रेजी सभ्यता के बंधन में रहते हुए कोई १५०० वर्ष बीत गए हैं | सूर्य विद्या के आधार पर इन १५०० वर्षो का अंत इस शताब्दी में (२०३९) हो जायेगा | *इस बीच सूर्य की प्रचंड शक्तियों का पृथ्वी पर आविर्भाव होगा और उससे वह तमाम शक्तियाँ नष्ट- भ्रष्ट हो जाएँगी, जो मानसिक दृष्टि से आध्यात्मिक न होंगी | जो लोग सूर्य शक्तियों से (गायत्री मंत्र से) सम्बन्ध बनायें रखेंगे, उसकी रक्षा और सनोन्नति उसी प्रकार होगी, *जिस तरह भयंकर ज्वार-भाटा आने पर भी समुद्र में पड़े फूलों का अनिष्ठ नहीं होता, जबकि बड़े-बड़े जहाज यदि साधे न जायें तो उस अनंत जल-राशि में डूब कर नष्ट हो जाते हैं | गायत्री उपासक इन परिवर्तनों को कौतुहल-पूर्वक देखेंगे और उन कठिनाइयों में भी स्थिर बुद्धि बने रहने का सहस उसी प्रकार प्राप्त करेंगे , जिस प्रकार माँ का प्यारा बच्चा माता के क्रुद्ध होने पर भी उनसे उनसे भयभीत नहीं होता वरन अपनी प्रार्थना से उन्हें शांत कर लेता है | *
पंडित श्रीराम शर्मा - वांग्मय - सावित्री कुंडलिनी एवं तंत्र पेज ३. ११८
#मित्रों आज हम आपको #गायत्रीसाधना व #गायत्रीमहामन्त्र जप के कुछ खास नियम के बारे में विस्तार से बताने का प्रयास करते हैं? सनातन धर्म के समस्त धर्म ग्रंथों में गायत्री की महिमा एक स्वर से कही गई। समस्त ऋषि-मुनि मुक्त कंठ से गायत्री का गुण-गान करते हैं। शास्त्रों में गायत्री की महिमा के पवित्र वर्णन मिलते हैं। गायत्री मंत्र तीनों देव, बृह्मा, विष्णु और महेश का सार है। गीता में भगवान् ने स्वयं कहा है ‘गायत्री छन्दसामहम्’ अर्थात् गायत्री मंत्र मैं स्वयं ही हूं।
यज्ञोपवीत धारण करना, गुरु दीक्षा लेना और विधिवत् मन्त्र ग्रहण करना—शास्त्रों में तीन बातें गायत्री उपासना में आवश्यक और लक्ष्य तक पहुंचने में बड़ी सहायक मानी गई हैं । लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि इनके बिना गायत्री साधना नहीं हो सकती है । ईश्वर की वाणी या वेद की ऋचा को अपनाने में किसी पर भी कोई प्रतिबन्ध नहीं हो सकता है ।गायत्री परब्रह्म की पराशक्ति है जो सम्पूर्ण जगत के प्राणों की रक्षा तथा पालन करती है । सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से लेकर आधुनिक काल तक ऋषि-मुनियों, साधु-महात्माओं और अपना कल्याण चाहने वाले मनुष्यों ने गायत्री मन्त्र का आश्रय लिया है । यह मन्त्र यजुर्वेद व सामवेद में आया है लेकिन सभी वेदों में किसी-न-किसी संदर्भ में इसका बार-बार उल्लेख है ।

सभी मन्त्रों का सिरमौर है गायत्री महामन्त्र!!!!

‘ॐ’ और ‘बीजमन्त्रों’ सहित गायत्री मन्त्र इस प्रकार है–

।।‘ॐ भू: भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्' ।।

अर्थ–‘पृथ्वीलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक में व्याप्त उस श्रेष्ठ परमात्मा (सूर्यदेव) का हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ कर्मों की ओर प्रेरित करे ।’

गायत्री साधना माता की चरण-वन्दना के समान है, वह कभी निष्फल नहीं होती है । भूल हो जाने पर उल्टा परिणाम या अनिष्ट भी नहीं होता है, इसलिए निर्भय और प्रसन्नचित्त होकर गायत्री साधना करनी चाहिए; क्योंकि चिन्तित, अशान्त, उद्विग्न, उत्तेजित व भयाक्रान्त मन एक जगह नहीं ठहरता है । एकाग्रता न होने से गायत्री जप में न मन लगेगा और न ही ध्यान, तब साधक में वह चुम्बक कैसे पैदा होगी जो मां गायत्री को अपनी ओर आकर्षित करके उसके लक्ष्य की सिद्धि में सहायता कर सकें ।

यज्ञोपवीत धारण करना, गुरु दीक्षा लेना और विधिवत् मन्त्र ग्रहण करना—शास्त्रों में तीन बातें गायत्री उपासना में आवश्यक और लक्ष्य तक पहुंचने में बड़ी सहायक मानी गई हैं ।

यहाँ यज्ञोपवीत धारण करने का तात्पर्य यह है कि गायत्री साधना के लिए संकल्पित होना मात्र हैं। यज्ञोपवीत गायत्री का प्रतीक है धारण करनेवाले को यज्ञोपवीत सदा याद दिलाती रहती है कि तुम साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि एक दिव्य शक्ति युक्त पुरुषों मे से एक हो तुम्हें गायत्री पुरःश्चण करना है।
#गुरुदीक्षा : गायत्रीमंत्र की गुरुदीक्षा वही दे सकता है जो वसिष्ठ गुणधर्म वाला हो जो विस्वामित्र व ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करता हो । जो कम से कम सवा करोड़ गायत्रीमंत्र का जप व 24 गायत्री पुरःश्चण अपने जीवन में कर चुका हो। सम्भवतः ऐसा गुरु आजकल मिलना संभव नहीं है। इसलिए परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी का ध्यान उगते सूरज करते हुए गायत्री साधना का संकल्प ले सकते हैं। ध्यान रखें ४० दिनों तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए प्रत्येक दिन दस माला गायत्रीमंत्र का जप करने के बाद ४१ वॉ दिन गायत्री साधना का संकल्प लें। हो सके तो गायत्री महाविद्धा के जानकार से यज्ञोपवीत धारण करने से पहले यज्ञोपवीत संस्कार करवा सकते हैं।

पुरुषों की तरह स्त्रियां भी गायत्री उपासना कर सकती हैं और ऐसा माना जाता है कि पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की साधना शीघ्र सफल होती है क्योंकि मां पुत्र की अपेक्षा पुत्रियों के प्रति ज्यादा उदार होती है ।

साधकों के लिए गायत्री मन्त्र जप के नियम

गायत्री मन्त्र का जप करने के लिए साधक को कुछ सामान्य नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए—

▪️ प्रात:काल स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ व धुले वस्त्र धारण करके गायत्री मन्त्र का जप करना चाहिए ।

▪️ जप एकांत, शांत, स्वच्छ और पवित्र स्थान पर करना चाहिए ।

▪️ प्रात: सूर्योदय से २ घण्टे पूर्व गायत्री साधना आरम्भ की जा सकती है । दिन में किसी भी समय जप किया जा सकता है लेकिन सूर्यास्त के एक घण्टे बाद तक जप पूरा कर लेना चाहिए ।

▪️ प्रात:काल गायत्री मन्त्र का जप खड़े होकर तब तक करें जब तक सूर्य भगवान के दर्शन न हो जाएं । इससे रात्रि में किये गये पाप नष्ट हो जाते हैं । संध्याकाल में गायत्री का जप बैठकर तब तक करें जब तक तारे न दीख जाएं । इससे दिन में किये गये पाप नष्ट हो जाते हैं ।

▪️ प्रात:काल जप करते समय पूर्व दिशा की ओर मुख करके जप करना चाहिए । मध्याह्न में उत्तर दिशा की ओर और सायंकाल पश्चिम दिशा की ओर मुख करके जप करना चाहिए ।

▪️ यदि घर में मां गायत्री की मूर्ति या चित्रपट किसी स्थान पर स्थापित है तो दिशा का विचार न करके उसके समीप बैठकर जप करना चाहिए ।

▪️ जप के समय नेत्र बंद करके आकाश में सूर्य के समान तेजस्वी मण्डल का ध्यान करना चाहिए। उसके मध्य में साकार उपासक गायत्री माता की मूर्ति का और निराकार उपासक ॐ अक्षर का ध्यान करते रहें । ध्यान का एक अन्य रूप है जिसमें वेदमाता गायत्री का ध्यान इस प्रकार करना चाहिए मानो वह हमारे हृदय सिंहासन पर बैठी अपनी शक्तिपूर्ण किरणों को चारों ओर बिखेर रही हैं और उससे हमारा अंत:करण आलोकित हो रहा है ।

▪️ गायत्री मन्त्र का जप कुशासन पर या ऊनी और रेशमी आसनों पर बैठ कर करना चाहिए । चमड़े के बने आसन पर गायत्री मन्त्र का जप नहीं करना चाहिए ।

▪️ जप के समय पालथी मारकर या पद्मासन में ही बैठना चाहिए । साथ ही बैठते समय रीढ़ की हड्डी को एकदम सीधा रखना चाहिए । कमर झुकाकर या आगे-पीछे हिलते हुए जप नहीं करना चाहिए और न ही जप के बीच में किसी से बोलना चाहिए ।

▪️ गायत्री मन्त्र का जप तुलसी या चन्दन की माला पर करना चाहिए । माला के अभाव में कर माला (उंगलियों के पर्वोंपर) पर भी जप किया जा सकता है ।

▪️ गायत्री मन्त्र का तान्त्रिक प्रयोग करते समय लालचंदन, शंख, मोती या रुद्राक्ष आदि की मालाओं का प्रयोग किया जाता है ।

▪️ प्रात:काल यदि जप कर रहे हैं तो बिना आहार के गायत्री मन्त्र जपना चाहिए ।

▪️ धूप-दीप जला कर जप करना और भी उत्तम है ।

▪️ माला को गोमुखी में डालकर या कपड़े से ढक कर जप करना चाहिए ।

▪️ गायत्री मन्त्र का जप करते समय माला के सुमेरु (माला के आरम्भ का सबसे बड़ा दाना) का उल्लंघन नहीं करना चाहिए । जप करते समय एक माला पूरी होने पर उसे मस्तक से लगाकर, सुमेरु को न लांघकर माला के दानों को फिर सुमेरु की उल्टी ओर से फेरना चाहिए ।

▪️ जप के समय तर्जनी उंगली का प्रयोग नहीं किया जाता है ।

▪️ जप की गिनती अवश्य करनी चाहिए क्योंकि बिना संख्या का जप ‘आसुर जप’ कहलाता है ।

▪️ गायत्री मन्त्र का मानसिक जप करना चाहिए । मन्त्र का उच्चारण करने में होंठ भी नहीं हिलने चाहिए । मन-बुद्धि के द्वारा मंत्र के प्रत्येक वर्ण व शब्द के अर्थ का चिन्तन करते हुए जो जप मन-ही-मन किया जाता है, वही जप श्रेष्ठ होता है ।

▪️ मन्त्र जप करते समय चित्त शान्त और एकाग्र होना चाहिए ।

▪️ गृहस्थ को प्रतिदिन कम से कम गायत्री मन्त्र की तीन माला (324 बार) का जाप करना चाहिए जबकि अधिक माला जपने की सुविधा हो तो ५, ७, ११, २७ ,३१ आदि विषम संख्या में मालाएं जपनी चाहिए । गायत्री मन्त्र का एक हजार बार जाप उत्तम माना गया है । ऐसा माना जाता है कि प्रतिदिन सात माला गायत्री मन्त्र का जप करने से शरीर पवित्र होता है, दस जप करने से स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है। तीन हजार बार जप करने से बर्तमान समय में सभी मनोवांछित मनोकामनाएं पूर्ण होता है और जन्म जन्मांतर का पाप नष्ट हो जाता है ।

▪️ वानप्रस्थी और संन्यासी को तीनों संध्याकाल में हर बार तीन हजार से अधिक की संख्या में गायत्री मन्त्र का जप करना चाहिए । सूर्यास्त के एक घण्टे बाद तक जप किया जा सकता है । रात्रि में जप नहीं करना चाहिए ।

▪️ जप करते समय बीच में उठना नहीं चाहिए । यदि किसी कारणवश उठना ही पड़े तो दोबारा हाथ-मुंह धोकर ही जप के लिए बैठना चाहिए ।

▪️मन्त्र जप का समय रोज-रोज बदलना नहीं चाहिए । प्रतिदिन नियत समय , नियत स्थान पर और नियत संख्या में ही गायत्री महामन्त्र जप करना चाहिए ।

▪️ जन्म-मृत्यु आदि अशौचकाल में या यात्रा या बीमारी के समय केवल मानसिक जप करना चाहिए ।

▪️ यदि कभी बाहर जाने पर या अन्य कारणों से जप छूट जाए तो थोड़ा-थोड़ा करके उस छूटे हुए जप को पूरा कर लेना चाहिए और एक माला प्रायश्चित रूप में करनी चाहिए ।

▪️ जप पूरा हो जाने पर त्रुटियों के लिए क्षमा-प्रार्थना कर गायत्री स्तोत्र या चालीसा का पाठ करना अच्छा रहता है । लेकिन इतना याद न हो तो परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्री राम शर्मा जी का ध्यान करते हुए केवल भावना से ही क्षमा-प्रार्थना कर लेनी चाहिए ।

▪️ गायत्री के उपासक को अपना आहार शुद्ध और सात्विक रखना चाहिए । मांस-मछली, अण्डा, मदिरा, तम्बाकू और गुटखा आदि अन्य तामसिक वस्तुओं का सेवन आजीवन नहीं करना चाहिए ।

#ध्यान_रखें जिनका आहार सात्विक नहीं है, वे भी गायत्री उपासना कर सकते हैं, क्योंकि गायत्री जप से उनकी बुराइयां समाप्त होने लगती हैं और वे कुछ ही दिनों में सतोगुणी बन जाते हैं ।

▪️ साधक को अपना व्यवहार भी शुद्ध, सरल और सात्विक रखना चाहिए ।कामवासना , क्रोध, झूठ बोलना, लोभ मोह , आलस्य प्रमाद, ईर्ष्या, परनिन्दा, कलह, निष्ठुरता व फैशनपरस्ती आदि से बचना चाहिए ।

▪️ उत्साह में कमी, नीरसता, जप से जल्दी लाभ न मिलना, बीमारी या अन्य सांसारिक कठिनाइयों का आना साधना के विघ्न हैं, इन विघ्नों से दृढ़तापूर्वक लड़ते हुए मन्त्र जप में निरन्तरता रहनी चाहिए ।

▪️ किसी भी मन्त्र की सिद्धि के लिए उस मन्त्र में श्रद्धा और विश्वास होना बहुत जरुरी है । श्रद्धा और विश्वास के बल पर ही ध्रुव और नामदेव को भगवान का साक्षात्कार हुआ । मनुष्य यदि वेद का अध्ययन न कर सके तो केवल गायत्री जप करने से ही वेदाध्ययन का फल मिल जाता है ।
इन नियमों का पालन करते हुए गायत्री मन्त्र का बारह वर्ष तक जप किया जाए और जो साधक सवा करोड़ गायत्री मन्त्र का जप कर लेता है वह समस्त सिद्धियों का स्वामी बन जाता है और अंत में मुक्ति प्राप्त करता है।
संदर्भ: गायत्री महा विज्ञान अखिल विश्व गायत्री परिवार

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Crafts time: Sudha—Swara and Lalithya helped kids with the crafts.

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